INVISIBLE FEELINGS
INVISIBLE FEELINGS
●कहते है भगवान नें अपनें हिसाब से जिसको जैसा बनाया है वो उसी रूप मे अपने आप मे बेहतर है ।
मेरे अंदर भी ईश्वर ने इनबिल्ट फीचर दिया है कि मै बचपन से ही अपने आप मे मदमस्त रहता हुँ,
मेरे अंदर भी ईश्वर ने इनबिल्ट फीचर दिया है कि मै बचपन से ही अपने आप मे मदमस्त रहता हुँ,
एक बार मै अपने पापा के साथ गोरखपुर किसी काम से जा रहा था और वो रास्ता गोरखपुर विश्वविद्यालय के रास्ते से होकर जा रहा था , मै स्टेशन से पापा के साथ-साथ चलते- चलते युनिवर्सिटी के पास वाले रास्ते से पीछे- पीछे चलने लगा और आस पास की अधिकारिक आवासों एवं पेङ -पौधो को देखने लगा , तभी अचानक पापा कि आवाज आई कि" क्यु पीछे इधर-उधर ताकते फिरते चल रहे हो" ! मै उस कुछ ही दुरी कि रास्ते मे इतना घुल गया था कि साथ - साथ चलते -चलते फिर पीछे हो गया , अर्थात कहने का आशय यह है कि मै अपने आप मे ही इन सब कार्यो से अभिभूत रहता हुँ, मुझे बाहरी दुनिया से ज्यादा लगाव नहीं रहता ।
इनसब सोच -विचार का फायदा यह हुआ कि मै जीवन कि हर पहलुओं पर सोचता रहता हु और आगे आने वाली कठिनाईयों का सामना करने मे मुझे मुश्किलों का सामना नही करना पङता ।
अच्छा सच कहूँ तो मै अपने आप को प्रकृति के बीच मे इतना खोया रहता हुँ और रहना चाहता हुँ कि मेरा वहीं जीवन का हिस्सा बन गया है ।
अच्छा सच कहूँ तो मै अपने आप को प्रकृति के बीच मे इतना खोया रहता हुँ और रहना चाहता हुँ कि मेरा वहीं जीवन का हिस्सा बन गया है ।
कभी-कभी तो लगता है कि अपने कुछ दुख शेयर करने तथा भावनाओ को समझने वाली सभी कि तरह मेरी भी एक गर्ल फ्रेंड हो , लेकिन फिर मन करता कि जितना सभी लड़के इस कार्य मे समय पैसा और मेहनत लगाते उतना न हम लगा पायेंगे और न ही लगाने का मन करता है ।
खैर मेरे जीवन मे दुख ज्यादे नहीं है इसका कारण मेरे घर मे ही मेरे अच्छे अभिप्रेरणा स्रोत मेरे माँ-बाप और छोटी दीदी , एवं बङी दीदी तथा परिवार के सभी सदस्य इन सब के कार्यव्यहार जो इतनी अच्छी उपलब्धियो को प्राप्त किये हुये है ,
छोटी दीदी ( Research Scholars Gujrat From B.H.U By Gujrat Public Comission "GRADE A " Central Government Post .) बङी दीदी( Junior High School Teacher Government of Uttar Predesh) इनके परिश्रम को तो मैने बहुत नजदीक से देखा , समझा और अनुभव भी किया है ।
जब घर में इतनी महान विभूति पङी हो कुछ कर गुजरने कि ललक भी होती है ।
खैर कभी-कभी मेरा दिमाग इन सब विभूतियो पर न लग कर माल पटाने पर लग जाता है , कुछ ट्राई करता हुँ फिर मन बोर होने लगता है , कयोंकि मै तो चाहता हुँ कि कोई पटाउ लेकिन मन है ना मानता नहीं गवही नहीं देता इन सब कामो को करने के लिये , लेकिन खैर ईश्वर का कृपा है कि मै जो चाह रहा था कि बिना मेहनत के मुझें माल प्राप्ती हो जाये वो भी हो गया , फिर भी मन डोलता रहता है ।
चुकि इंसान कभी भी खुश नहीं रह सकता जबतक उसकी जेनेटिक संतुष्टी न मिले , इन सब का कारण ये है कि मै अच्छे छात्रों का साथ किया ही नहीं हुँ,।
कभी आप गौर से अनुभव करेंगे तो पायेंगे कि अगर आप पढ़ने-लिखने मे थोङा कमजोर है और ,आपका साथ भी ऐसे ही बच्चों से हुआ है जो पढते लिखते नहीं है तो आपको कभी पढ़ने का मन भी नहीं करेगा ।
संग का रंग इस कदर चढेगा कि कभी किताब छुने का मन भी नहीं करेगा और ये " न पढने" कि ओर अभिप्रेरीत करेंगे,
और अगर माँ-बाप पढ़ने के लिये थोङा बहुत डांट दिये तो आप कहेंगे कि अभी हमसे भी बदतर लङके है सब जो कभी किताब- कापी ही नहीं छुते है सब ।
अभी-अभी तो फिलहाल में ऐसे छात्रो को देखा हुँ जो देश के अच्छे शहर मे पढने गये है लेकिन उनको अपनें ही परीक्षा कि समय सारणी मे अपने कक्षा का विषय खोजने मे आलस आता है और खोज के लिख के वाट्सएप करने को बोलते है , मे भी हैरान हो जाता हुँ कि आखिर ये परीक्षा कैसें देंगे।
दोस्तों अब वो दिन जा रहा है जब लोग कहते थे कि" हम तो आज जाने है कि फलां विषय का परीक्षा है वो भी फलां दोस्त बताया है फोन करके तो तैयार होकर चले है ।
1.खैर मैं कहाँ भटक गया बातों - बातों मे पता ही नहीं चला
पहले जब मै विद्या मंदिर मे पढता था तो मै अपने से अच्छे बच्चों, दोस्तो मित्रो का साथ करता था जैसे कक्षा 7 से प्रवीण मणि त्रिपाठी जिसके पास बैठने से मेरा पढने मे रूचि आया और मै सच मे जीवन मे पहली बार सातवीं मे लगभग 78. _ _ कुछ % पाया था , ये वो पल था जब मेरी दोस्ती गहरी होती चली और आपस मे हम दोनो चर्चा कर के एक दुसरे को अपना पाठ याद करके सुनाते, शर्त भी लगता था मज़ा भी आता था , एक दुसरे के सुख-दुःख मे साथ होते थे और हमारे प्रवीण मे लङाई भी होती थी पर ये दोस्ती धीरे-धीरे एक सच्ची मित्रता मे बदल गई जो फिर एक दुसरे को पास बुला लेती जो आज भी है । कक्षा आठवीं तथ हम प्रवीण पास बैठते थे लेकिन ,
जब घर में इतनी महान विभूति पङी हो कुछ कर गुजरने कि ललक भी होती है ।
खैर कभी-कभी मेरा दिमाग इन सब विभूतियो पर न लग कर माल पटाने पर लग जाता है , कुछ ट्राई करता हुँ फिर मन बोर होने लगता है , कयोंकि मै तो चाहता हुँ कि कोई पटाउ लेकिन मन है ना मानता नहीं गवही नहीं देता इन सब कामो को करने के लिये , लेकिन खैर ईश्वर का कृपा है कि मै जो चाह रहा था कि बिना मेहनत के मुझें माल प्राप्ती हो जाये वो भी हो गया , फिर भी मन डोलता रहता है ।
चुकि इंसान कभी भी खुश नहीं रह सकता जबतक उसकी जेनेटिक संतुष्टी न मिले , इन सब का कारण ये है कि मै अच्छे छात्रों का साथ किया ही नहीं हुँ,।
कभी आप गौर से अनुभव करेंगे तो पायेंगे कि अगर आप पढ़ने-लिखने मे थोङा कमजोर है और ,आपका साथ भी ऐसे ही बच्चों से हुआ है जो पढते लिखते नहीं है तो आपको कभी पढ़ने का मन भी नहीं करेगा ।
संग का रंग इस कदर चढेगा कि कभी किताब छुने का मन भी नहीं करेगा और ये " न पढने" कि ओर अभिप्रेरीत करेंगे,
और अगर माँ-बाप पढ़ने के लिये थोङा बहुत डांट दिये तो आप कहेंगे कि अभी हमसे भी बदतर लङके है सब जो कभी किताब- कापी ही नहीं छुते है सब ।
अभी-अभी तो फिलहाल में ऐसे छात्रो को देखा हुँ जो देश के अच्छे शहर मे पढने गये है लेकिन उनको अपनें ही परीक्षा कि समय सारणी मे अपने कक्षा का विषय खोजने मे आलस आता है और खोज के लिख के वाट्सएप करने को बोलते है , मे भी हैरान हो जाता हुँ कि आखिर ये परीक्षा कैसें देंगे।
दोस्तों अब वो दिन जा रहा है जब लोग कहते थे कि" हम तो आज जाने है कि फलां विषय का परीक्षा है वो भी फलां दोस्त बताया है फोन करके तो तैयार होकर चले है ।
1.खैर मैं कहाँ भटक गया बातों - बातों मे पता ही नहीं चला
पहले जब मै विद्या मंदिर मे पढता था तो मै अपने से अच्छे बच्चों, दोस्तो मित्रो का साथ करता था जैसे कक्षा 7 से प्रवीण मणि त्रिपाठी जिसके पास बैठने से मेरा पढने मे रूचि आया और मै सच मे जीवन मे पहली बार सातवीं मे लगभग 78. _ _ कुछ % पाया था , ये वो पल था जब मेरी दोस्ती गहरी होती चली और आपस मे हम दोनो चर्चा कर के एक दुसरे को अपना पाठ याद करके सुनाते, शर्त भी लगता था मज़ा भी आता था , एक दुसरे के सुख-दुःख मे साथ होते थे और हमारे प्रवीण मे लङाई भी होती थी पर ये दोस्ती धीरे-धीरे एक सच्ची मित्रता मे बदल गई जो फिर एक दुसरे को पास बुला लेती जो आज भी है । कक्षा आठवीं तथ हम प्रवीण पास बैठते थे लेकिन ,
2 .नवम् मे वयवस्था अलग होने कि वजह से मै आगे बैठने लगा सबसे किनारे बाये ओर से अखिल, निर्भय, आनंद अवनीश, मै और ओंकार बैठते थे , चूंकि मेरा प्रवीण के साथ बैठते - बैठते अच्छे छात्रों का चुनाव करना सीख गया था , मेरा हंसी मजाक के लियें ओंकार था प्रशाशनिक मदद के लिए अवनीश और भावनात्मक एवं शैक्षिक कार्यों के लिए आनंद का साथ किया जो पढ़ने-लिखने मे मेधावी छात्र था , धीरे-धीरे आनंद और हम लोग एक अच्छे मित्र कि तरह आपस मे रहने लगे आनंद हमको जब भी हम गलत कार्य करते मना अभिप्रेरणात्मक रूप से मना करता चुकि मै बचपने से अस्थिर था चैन मेरे शरीर मे था ही नही और ना इस समय भी है , लेकिन मै उसके बोलने पर मान जाता और फिर कहते "अच्छा भाई अब ना करब " हमलोग एकसाथ लगभग भोजन भी करते थे और नीचे विद्यालय के मैदान मे एकसाथ हाथ धो कर गपशप करते-करते टहलते ,
वो दिन याद करके मे बहुत रुंध गया हुँ😭😭 क्युकि मै जल्दी रो नहीं पाता कि वो भाव आँसुवों के रूप मे निकल पायें ।
3. फिर मै कक्षा दसवीं मे संस्कृत से होने के कारण दशम 'क ' वर्ग मिला जिसमे अधिकतर होनहार तथा मेधावी छात्र थे कुछ ही कि संख्या मे उपद्रवी छात्र थे लेकिन काफ़ी प्रभावशाली थे , खैर समय और भगवान को भी मेरी भलाई मंजूर थी और भाग्य देखिये कि मेरे दोनो अनमोल रत्न प्रवीण और आनंद भी उसी वर्ग मे थे मन मे एक सुकून हुआ कि चलो कम से कम साथ तो मिला , मै बहुत भाग्यशाली मानता हुँ अपनें आप को कि मेरे जितने भी मित्र मिले मुझे काफी अच्छे मिलें और हमेशा-हमेशा अच्छे मिलते रहना ये सबके भाग्य मे नहीं होता , दसवीं के कक्षाचार्य नागेश मणि जी बने जो मेरे सबसे अच्छे पसंदीदा आचार्य थे ।
वो मेरा खुराफाती चरित्र से काफ़ी भली भांति परिचित थे अतः मेरे अच्छे हने के लिये वो मुझे आगे वाले बेंच पर अशीष त्रिपाठी, मै और आनंद तीन लोगो को बैठा दिया , जब मुझे ईश्वर आचार्य और परिस्थति तीनो ने साथ दिया मै तो मै भी उसमें जब तक नागेश आचार्य जी थे तबतक बदमाशी नही करने का प्रण लिया था , और वो जीवन मे मेरा एकमात्र ऐसा वर्ग था जिसमे मेरे अभिभावक से जब तक आचार्य जी थे तब तक कोई शिकायत का मौका नहीं दिया , उनके चले जाने के बाद नीरज मास्टर को खुब परेशान किया था ,
खैर समय चलता गया हमारा और आशीष संवाद बढता गया एक दुसरे का टीफीन खाने लगे उसकी मम्मी बहुत पतला पुङी बनाती थी सरपुतिया के सब्जी के साथ कभी-कभी मै उसका पुरा खाना मांग लेता था मेरा अशीष की दोस्ती एक नटखट सी थी मस्ती थी थोङा वो शांत लङका था मै उसको हँसाता रहता ये दोस्ती आगे मित्रता मे बदली और आज भी मै उसको उसी तरह अपने जान कि तरह मानता हुँ ।
4. फिर आया मै वाणिज्य संकाय से एकादश ' घ' मे इसमें आया तो सच मे जैसा स्तर है ना वैसे ही छात्र भी थे सब इसमे आ गये थे सब ,
जब मै गौर किया तो पाया कि मेरे मोहल्ले रामगुलाम टोला के सारे उपद्रवी जो पहले इधर-उधर कक्षाओं मे बिखरे पङे थे सब इसी मे आ गये थे सब , चुकि यहीं उन सब के लिये अन्तिम विकल्प भी था मै भी कौन ज्यादा होनहार ही था कि NASA मे जाता , मन मे बहुत गुदगुदी हो रही थी कि कब हुङदंग करने को मिले खैर वो भी समय आ ही गया और मै उत्पात पर उतर आया और अपना असली रूप दिखा दिया जो कई वर्ष से जंग खा रहा था ,
सच मे ये पुरा क्लास D ग्रेड हो भी गया था,
एककाद अपवाद भी थे होनहार छात्र जो CA बनने के उम्मीद से आये थे ,
इस कक्षा मे विवेक चौहान और निर्भय शाही जो पुराने सहपाठी थे लेकिन पास न बैठने के कारण इनसे मिलने मे देरी हो गई निर्भय से दोस्ती बढती गई हमलोग इसमे भी आगे वाले बेंच पर बैठते थे और आगे से ही दुस्साहस करने का प्रयास करते थे , चूंकि निर्भय का दिमाग थोङा चलाक था और विवेक थोङा ज्यादा नहीं लेकिन हमसें शांत स्वभाव का था । अतः निर्भय से साथ गहरा होता गया हर इंसान मे जिस चीज़ कि कमी होती वह उसको पुरा करना चाहता निर्भय कि चतुर बुद्धि हमको पंसंद आने लगी फिर हम दोनो से हम तीनो एक अच्छे दोस्त कि तरह रहने लगे उस समय तक मेरे TOP 5 STAR दोस्त हो गये थे इनको लेकर ,
उस समय हमको समझ आया कि सच मे दोस्त का मतलब सिर्फ पढ़ाई लिखाई ही नहीं होता संवेदनाओं कि भी कद्र होती है खैर निर्भय और विवेक भी हमसे पढने -लिखने मे ठीक ही थे सब , ये दोनो मुझे भावात्मक रूप से बहुत अच्छे लगे और मै इन दोनो से अपनी बाते शेयर करता कि भाई आज ऐसे हुआ , कभी-कभी ये दोनो मुझे विषम परिस्थिति से बाहर निकलने का रास्ता भी बताते सच भे एक मेरे ये दोनो एक अच्छे दोस्त से मित्र का रूप बन गये थे, आज निर्भय मेरा मित्र दोस्त इस दुनिया मे तो नहीं है लेकीन उसकी जो यादे है वो कभी नहीं भुलती ।
वो बाते याद आती थी कि जब विवेक को कक्षा अनुशासन प्रमुख बना के और हम खुब उपद्रव करते थे तब विवेक हँसता था सोचता था कि हमके बली चढा के ई कुल मस्ती कर ताने सन उपद्रवी साले ।
आज मेरे जीवन मे पांच से चार ही मित्र है जो मेरे लिये बहुत खास है और रहेंगे क्यो कि मित्र ही एक ऐसा पात्र होता है जो भला सोच सकता है ,
विवेक से तो मेरा उतना पहलें लगाव नहीं था लेकिन ग्यारहवीं मे उसका साथ एक अलग ही विचारधारा को जन्म दिया ,
वो मेरे समस्याओं का समाधान प्रोफेशनली करता है , वो भी हमेशा कहता रहता है" साले मत रहू ते इ कुल चीज़ मे का परेशान होले" , चुकि उसके घर आते -जाने के वजह से मेरे घर के लगभग सभी सदस्य उसका नाम जान गयें है । और लगभग वो भी एक परिवारीक बंदा हो गया है । मेरे पिताजी जी इसको और प्रवीण को भलीभांति चिर-परिचित हो गये है 😂।
आज मेरे दो दोस्त , तो बाहर रहते है उनसे उतना समपर्क नहीं रह पाता लेकिन मै बहुत भाग्यशाली हुँ कि दो इसी देवरिया मे है फिलहाल जिससे मै अपनी संवेदनाये प्रकट कर सकता हूँ ।
इसी कङी मे मेरा कक्षा आठवीं मे एक सच्चे दोस्त कि तरह हर वक्त साथ देने वाला अभिषेक वर्मा भी था जिसे मै अपने ही व्यवहार के कारण खो दिया , और वो आज हमसे थोङा -बहुत बोलता है , अभिषेक वर्मा मेरे पिताजी जी के बचपन के दोस्त का सुपुत्र था , और मेरे ही मोहल्ले का था उसका घर हमारे घर से दुर था वो मेरे घर के रास्ते हमारे साथ स्कुल जाता , ये दोस्ती भी बहुत अच्छी चल रही थी , लेकिन एक बार किसी लङके द्वारा फ्री में किताब देने का आफर किया, हम दोनो उसको जानते थे , और मै वह किताब लेना चाहता था , और यही कारण है कि वो किताब किसी को शायद नहीं मिलीं , इस बात कि ग्लानि मुझे हमेशा रहती है कि अभिषेक को मै अपने आचरण से खो दिया ।
मै सोचता हुँ कि मुझे अभिषेक कभी इत्मीनान से मिले तो मै अपनी गलतियों का पश्चाताप कर सकु , मेरा यह दोस्त और एक अच्छा मित्र मुझे घर के सदस्य कि तरह मानता था , चूंकि मेरी परवरिश ही ऐसे हुई है कि मै भावनाओं की बहुत कद्र करता हुँ , उस समय नादानी मे ऐसा घटना हो गया था , अगर वो साथ दिया तो फिर हम मिलकर TOP 5 हो जायेंगे ।
चूंकि मैं अच्छे दोस्त अपने हिसाब-किताब से जांच- परख के बनाता हुँ , हर एक को हरएक कसौटियों पर देखता हुँ तब जाकर उसे मेरा मन एक दोस्त मानने को तैयार होता है ,
चूंकि दोस्त - मित्र ऐसे होने चाहिए कि जिससे कुछ सीखने को मिले , अच्छे कार्यो को देख कर अभिप्रेरणा मिले , आप खुद ही नखादा रहेंगे और नखादो का साथ भी करेंगे तो , आपका जीवन स्तर कभी बेहतर नहीं होगा , और न ही आप समाज़ मे आने वाली पीढ़ी को कुछ दे पायेंगे।
वो बाते याद आती थी कि जब विवेक को कक्षा अनुशासन प्रमुख बना के और हम खुब उपद्रव करते थे तब विवेक हँसता था सोचता था कि हमके बली चढा के ई कुल मस्ती कर ताने सन उपद्रवी साले ।
आज मेरे जीवन मे पांच से चार ही मित्र है जो मेरे लिये बहुत खास है और रहेंगे क्यो कि मित्र ही एक ऐसा पात्र होता है जो भला सोच सकता है ,
विवेक से तो मेरा उतना पहलें लगाव नहीं था लेकिन ग्यारहवीं मे उसका साथ एक अलग ही विचारधारा को जन्म दिया ,
वो मेरे समस्याओं का समाधान प्रोफेशनली करता है , वो भी हमेशा कहता रहता है" साले मत रहू ते इ कुल चीज़ मे का परेशान होले" , चुकि उसके घर आते -जाने के वजह से मेरे घर के लगभग सभी सदस्य उसका नाम जान गयें है । और लगभग वो भी एक परिवारीक बंदा हो गया है । मेरे पिताजी जी इसको और प्रवीण को भलीभांति चिर-परिचित हो गये है 😂।
आज मेरे दो दोस्त , तो बाहर रहते है उनसे उतना समपर्क नहीं रह पाता लेकिन मै बहुत भाग्यशाली हुँ कि दो इसी देवरिया मे है फिलहाल जिससे मै अपनी संवेदनाये प्रकट कर सकता हूँ ।
इसी कङी मे मेरा कक्षा आठवीं मे एक सच्चे दोस्त कि तरह हर वक्त साथ देने वाला अभिषेक वर्मा भी था जिसे मै अपने ही व्यवहार के कारण खो दिया , और वो आज हमसे थोङा -बहुत बोलता है , अभिषेक वर्मा मेरे पिताजी जी के बचपन के दोस्त का सुपुत्र था , और मेरे ही मोहल्ले का था उसका घर हमारे घर से दुर था वो मेरे घर के रास्ते हमारे साथ स्कुल जाता , ये दोस्ती भी बहुत अच्छी चल रही थी , लेकिन एक बार किसी लङके द्वारा फ्री में किताब देने का आफर किया, हम दोनो उसको जानते थे , और मै वह किताब लेना चाहता था , और यही कारण है कि वो किताब किसी को शायद नहीं मिलीं , इस बात कि ग्लानि मुझे हमेशा रहती है कि अभिषेक को मै अपने आचरण से खो दिया ।
मै सोचता हुँ कि मुझे अभिषेक कभी इत्मीनान से मिले तो मै अपनी गलतियों का पश्चाताप कर सकु , मेरा यह दोस्त और एक अच्छा मित्र मुझे घर के सदस्य कि तरह मानता था , चूंकि मेरी परवरिश ही ऐसे हुई है कि मै भावनाओं की बहुत कद्र करता हुँ , उस समय नादानी मे ऐसा घटना हो गया था , अगर वो साथ दिया तो फिर हम मिलकर TOP 5 हो जायेंगे ।
चूंकि मैं अच्छे दोस्त अपने हिसाब-किताब से जांच- परख के बनाता हुँ , हर एक को हरएक कसौटियों पर देखता हुँ तब जाकर उसे मेरा मन एक दोस्त मानने को तैयार होता है ,
चूंकि दोस्त - मित्र ऐसे होने चाहिए कि जिससे कुछ सीखने को मिले , अच्छे कार्यो को देख कर अभिप्रेरणा मिले , आप खुद ही नखादा रहेंगे और नखादो का साथ भी करेंगे तो , आपका जीवन स्तर कभी बेहतर नहीं होगा , और न ही आप समाज़ मे आने वाली पीढ़ी को कुछ दे पायेंगे।
फिलहाल मे तो मेरे साथ कुछ सहपाठी बंधु अभिषेक मिश्रा एवं मोनु द्विवेदी भी है ये दोनो देवरिया के एक ही मोहल्ले मे रहते है , और मोनु का बिहार से ताल्लुकात होने के वजह से थोङा चालाक और चतुर है।
लेकिन वह थोड़ा दुसरे मिज़ाज का लङका है उसका नियम यह है कि वह है कि वह कहीं भी"" दो पैसा लगायेंगा तो चार पैसा निकालने का सोचता है "" लेकिन यह हर परिस्थिति मे ऐसा नहीं होना चाहिए लेकिन वह करता , वो बहुत अच्छा लङका है लेकिन जरूरत पड़ने पर वह किसी का भी उपयोग अपने लिये चालाकी पुर्वक कर सकता है ।
एक बार कि घटना है कि हम, मोनु ,अभिषेक पार्क मे बैठे थे तभी फ्लिपकार्ट के विषय पर चर्चा हो रहा था कि कैसे पैसा आयेगा तो मोनु उस समय एक लङके का आधार मंगाकर उसका अटैचमेंट कर के शायद दुरूपयोग किया अर्थात कहने का आशय यह है कि कोई वयक्ति जिस भाव से आपको मानता और विश्वास करता आपको भी उसी पर खरा उतरना चाहिये और , और भावनाओं कि कद्र करना चाहिये जो उसके अंदर शायद कम है , लेकिन इसके बावजूद भी वो मेरा एक अच्छा दोस्त सहपाठी है , और मै लगभग हमेशा चौकन्ना रहने का प्रयास करता हुँ , और अभिषेक भी अच्छा बालक है वह सेवाभावी और बहुत सामाजिक वयक्ति है तथा थोङा सा डरपोक भी है , हम सभी थोङा रिस्क लेकर चलते है उसको जहाँ कहीं गङबङ दिखेगा वो चलता बनेगा इन सब बातों से मै बहुत प्रभावित रहता हुँ ,
मै इन दोनो को हमेशा पढ़ने के लिये प्रोत्साहित करता हुँ लेकिन ये सब पढते ही नहीं है सब , ये दोनो काफी मस्ताने किस्म के है , और मै भी न दिनों इन सब मे रम गया हुँ।
लेकिन मै हमेशा एक ही भाव मे नहीं रहता उन्मुक्त गगन मे जीने कि आदत और अकेले अपने आप से बाते करने
तथा चीजों को कई बार Analysis करने मे मुझे बहुत मज़ा आता है,
और पढ़ने का भी मन करता है तो कभी-कभी इन सब कुरीतियों के कारण अच्छे से पढ नहीं पाता कभी-कभी तो मन करता है ये सारे रिश्ते छोङछाङ के अकेले हो जाउ और खुले आकाश मे कुछ सोचता रहूँ ।
खैर मै हमेशा सोचता हुँ कि मै भी सफल हो जाउ और हमारे सारे मित्र भी सफल हो जाये ताकि कभी जीवन मे किसी को कोई कष्ट का सामना न करना पङे , दोस्तो आर्थिक तंगी एक ऐसी अवस्था है जिससे इंसान जीते जीते भी मरे जैसा अनुभव करता है , सिर्फ कमाना खाना ही उद्देश्य नहीं रहना चाहिए समाज मे आये है तो कुछ कर के, दुनियां के इस खुबसूरती को निहारते चलना चाहिए ,
अपने मामा और मम्मी के घुममकङी के कारण मैने भी देश के दक्षिण एवं उत्तर भाग लगभग घुम लिया है और भारत को कुछ जान भी लिया है ।
सच मे दोस्तो सारी चिंताओं को छोङकर कही घुमने जायेंगे देंगे तो बहुत ही मज़ा आता है , इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मेरे पिताजी है जो घुमने जब जाते है तो बहुत खुश हो जाते है जैसे लगता है कहाँ आ गये है 😂।
जीन्दगी आपको अपनी ही बहुत प्यारी लगने लगेंगी इस अतुल्य भारत मे बहुत कुछ देखने को है जीवन कम पङ जायेंगे भारत को जानने मे, । दोस्तो अगर आप ये पढ रहे होंगे तो मेरा एक निवेदन है कि आप अपने पैसे रुतबे किसी और से तुलना ना करे इससे ये होगा कि आप हमेशा कुछ अपनें आप मे अपूर्ण सा महसूस करेंगे आप हमेशा अपने आप से तुलना करे जीवन का परम आनंद इसमे भी बहुत होता है Analysed yourself.
ये सारे कार्य तभी हो पायेंगे जब हम अर्थिक रूप से अच्छे रहेंगे और ये कहीं ना कहीं इसका आधार पढ़ाई है जो जीवन को एक नई दिशा और दशा देता है ।
मै भी इसीलिए पढ़ना चाहता हुँ कि पुरा भारत घुम सकु अच्छे से अकेले जिन्दगी भर ।














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