UNEXPECTED DEATH

                            UNEXPECTED  DEATH 



यह बात उस शख्स की है जिसनें मुझे बचपन से ही , एक ऐसा मार्गदर्शन दिया जिसका मै सदैव अभारी रहूँगा ।
हर किसी के आस पास कुछ ऐसे लोग रहते है जिनके आचार-विचार अनुकरणीय होते है । उनके कार्य शैली को देखकर अपन को हमेशा मन मे ये बात जरूर आता कि ये इंसान बहुत ही समझदार , और धैर्यवान है ।
यह बात मेरे अपने मोहल्ले के स्वर्गीय श्रीमान सतीश त्रिपाठी की है जिनके अचानक जाने की खबर मुझें और मेरे मन को बहुत विचलित कर गई । 




सच कहूँ तो मै यह भावना रुपी लेख जब लिख रहा हूँ तो जैसे -जैसे मेरी अंगुलीयाँ अक्षरो पर जा रही है उतनी ही तेजी से चाचा के प्रति जो मन मे दबा दुख है वो आखों के रास्ते बाहर निकल रहा है ।
ये बात उन पढ़ने वाले को भले ही न मालूम चले पर वास्तविकता तो ये है कि जिसके उपर घटना घटती है वही समझ सकता है ,
एक कुशल और आदर्श व्यक्तित्व का मेरे सर पर से अचानक से हाथ उठ जाना बहुत ही पीड़ादायक है ।


  




चाचा जी मेरे पिताजी से से बङे होने के नाते मेरे बङे पापा के समान ही थे , मोहल्ले मे तो आज भी बहुत ही होनहार और पढ़े- लिखे लोग है जो आज उच्च पदों पर अधिकारी भी है ,
लेकिन सतीश चाचा का प्रेम और लगाव कुछ अलग ही आनंद की अनुभूति करता था ।

घर मे अकेले रहने के बाद भी अकेलापन नही महसूस होता , हमेशा लगता कुछ कर्म-कान्ड होगा तो चाचा है निपटा देंगे , और सच मे वो थे भी दिलदार ,
बडप्पन तो उनके आचरण मे था , बहुतों को अपने इस 20-21 वर्ष के उम्र मे देखा काफ़ी पढ़े-लिखे और समझदार लोग है लेकिन फिर भी चाचा जी का व्यवहार कुछ अपनत्व सा महसूस कराता था।


घर में कुछ कार्यक्रम होता तो सतीश चाचा खुद राय देते पिताजी को कि " काम हे तरे कराव और बढ़िया रही "

पेशे से तो वह इंटर कालेज के अध्यापक थे। और शायद अध्यापक होने के वज़ह से भी उनके व्यवहार ऐसे थे जैसे एक शिक्षक कक्षा मे बैठे विभिन्न प्रकार के छात्रों को एक साथ संभालता है , उसी प्रकार मोहल्ले के विभिन्न प्रकार के व्यवहार वाले लोगो को संभालने -समझाने मे उन्हे महारत हासिल थी।


जब चाचा पहली बार बिमार पङे थे तब मेरे पिताजी उन्हे गोरखपुर देखने गये थे , और उनके साथ मोहल्ले के गणमान्य लोग जैसे सभासद, नगर अध्यक्ष , सभी लोग गये थे
इस बात से ये सिद्ध होता है कि किसी के व्यक्तितव मे अगर खास बात होगी तो उसके साथ खास लोग जरूर रहेंगे ।


फिर जब चाचा का तीसरी बार गंभीर रूप से तबियत खराब हुआ तो लगा की अपन के घर मे भी कुछ हो गया हो 
खाने के एक निवाला भी खाने मे जैसे तकलीफ हो रही थी , ।

    




मुझे इस बात का अंदर से बहुत दुख था कि जब चाचा मोहल्ले मे अंतिम बार टहलने निकले थे तो उनको मै प्रणाम नहीं कर पाया , इस बात की कमी मुझें अपने जीवन भर रहेगी , और यही वजह थी की मै आज तक किसी के अंतिम संस्कार मे घाट तक नहीं गया और उनके अंतिम संस्कार मे मुझे जाने का दिल से मन किया और अपन बिना किसी रोक-टोक के चल दिया ।


     



जब उनकी अस्थियाँ जल रही थी तो मानों उन अस्थियों मे से मुझे सतीश चाचा बोल रहे थे कि "ए आशु इधर कहाँ आ गये ,जल्दी घर जाओ रात मे कहाँ घुम रहे हो । 

मोहल्ले  के एक जिम्मेदार नागरिक  के चले जाने से गली बहुत  सुना हो गया है , रोज की तरह " ए रामबहाल , और शिब्बू  जैसे शब्द  अभी भी चीर काल तक कानों  में  गूँज  रहे है  । 
 लग रहा है एक गार्जयन ही चला गया इस दुनिया  से  ऐसा  अकेला और शांत  सा गली हो गया है ।

सच कहे तो चाचा आज भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी कही गई हर बाते मेरे दिल मे अभी भी सजीव रूप से जिन्दा है ।
उनके सुपुत्र शिबु भईया ने अंतिम यात्रा के समय जो बात बोली थी कि "सतीश त्रिपाठी अमर रहे वो वाकई मे औरों कि तो मै नहीं कह सकता क्योकि समय के साथ सब कुछ भुला देता है इंसान लेकिन अपन के दिल मे सतीश चाचा हमेशा अमर रहेंगे ।





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